मीराँबाई का जीवन परिचय व इतिहास Meerabai Biography & History in Hindi

मीराँबाई का जीवन परिचय व इतिहास Meerabai Biography & History in Hindi

हिंदी के सर्वश्रेष्ठ भक्त कवियों में मीराबाई का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है मीराबाई अपने माता – पिता की इकलौती पुत्री थी। मीराबाई के पिता का नाम रत्न सिंह राठौर और माता का नाम वीर कुमारी था। मीराबाई के जन्म के कुछ वर्षो पश्चात उनकी  माता का स्वर्गवास हो गया। मीरा का पालन-पोषण मीरा के दादा राव दूदा ने किया। मीराबाई की दादी विष्णु भगवान की भक्त बताई जाती है। मीरा बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण से प्रेम करने लगी थी।

 

मीराँबाई का जीवन परिचय ?

मीराबाई का जन्म 1498 ई. में मेड़ता (राजस्थान) के कुड़की गांव में हुआ था। मीरा के पिता रतनसिंह राठौड़ राजपूत रियासत के राजा थे। थे। और उनकी माता वीर कुमारी थी। मीरा का पालन पोषण उसके दादा-दादी ने किया। उसका दादा भगवान विष्णु का परम भक्त था जो ईश्वर में अत्यंत विश्वास रखती था।

मीराँबाई का जीवन परिचय व इतिहास Meerabai Biography & History in Hindi !
संत मिराँबाई कृष्ण भक्त

मीरा दादा की विष्णु भक्ति को देखकर बहुत ज्यादा  प्रभावित हुई। एक दिन जब एक बारात उनके घर के बाहर से से जा रही थी। तब मीरा ने उस दूल्हे को देखकर अपनी दादी से दादी मेरा दूल्हा कैसा होगा। मीरा के हाथ मे एक छोटी सी कृष्ण की मूर्ति थी दादी उसे ने देखकर तुरंत बोली की गिरधर गोपाल जैसा और उसी दिन से मीरा ने गिरधर गोपाल को अपना वर मान लिया।

मीरा का संपूर्ण बचपन मेड़ता में ही बीता क्योंकि उसके पिता रतन सिंह राठौड़ बाजोली की रियासत के राजा थे जो मीरा के साथ नहीं रहा करते थे।

नाम– मीराबाई

जन्म– 1498 ई.

जन्म स्थान – कुड़की गाँव (राजस्थान)

पिता – रत्न सिंह राठौर

माता – वीर कुमारी

कर्म भूमि – वृन्दावन

मृत्यु – 1547

मीराँबाई का बचपन ?

मीराँ  बचपन से ही कृष्ण के प्रेम और भक्ति में रहने लगी थी बचपन से ही कृष्ण के गीत श्लोक गाती और नाचती सत्संग करने लग गयी थी। मीराँ जब छोटी बच्ची थी तो उसके बाहर से एक बारात गुजर रही थी। उस बारात को देखकर मीराँ ने अपनी माँ से पूछा मेरा वर कैसा होगा कैसा दिखता होगा। उस समय मीराँ के हाथ मे एक छोटी सी कृष्ण की मूर्ति थी। माँ ने कृष्ण की मूर्ति को देखकर बोली। कृष्ण जैसा तभी से मीराँ ने कृष्ण भगवान को ही अपना पति मान लिया।

कहा जाता है कि एक बार मीराँ के घर कोई साधु संत आकर ठहरे थे। साधु के हाथ मे एक छोटी सी कृष्ण की मूर्ति थी। जिसे मीराँ ने देख लिया और उसे पाने के लिए साधु से माँगने लगी। लेकिन साधु ने कृष्ण की मूर्ति मीराँ को नही दी। कहा जाता है उस रात साधु के सपने में स्वयं  कृष्ण आये और मीराँ को मूर्ति देने के लिए कहा। सुबह उठते ही साधू ने कृष्ण की मूर्ति मीराँ को दे दी।

मीराँबाई का विवाह ?

मीराँ का विवाह 1516 ई. में कम उम्र में ही मेवाड़ के महाराणा साँगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। विवाह होने के कुछ ही वर्ष पश्चात उनके पति का निधन हो गया और मीराँ संसार को त्याग कृष्ण की भक्ति में लीन हो गयी। और कुछ समय बाद उनके ससुर का भी देहांत हो गया। इतना सब कुछ होने के बाद से मीराँ के व्यवहार में बदलाव आ गया। लेकिन इस बदलाव से नाखुश होकर उनके ससुर के भाई उनको बहुत ज्यादा परेशान करने लगे। और मीराँ को मारने का प्रयास भी किया गया। जिस से मीराँ को विष पिला दिया गया लेकिन मीराँ बच गयी। और मीरा महल के सुखों से आज़ाद होकर मंदिरों में रहने लगी। मीराँ ने ज्यादातर रचनाओं में कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम और भक्ति को दर्शाया गया है ।।

मीराबाई के पद व रचनाएँ ?

मीराँबाई पद्मावली से कुछ महत्वपूर्ण पद। इस पद में मीराबाई कृष्ण के प्रति प्रेम भाव को प्रकट करती है 

पद मोरे नैयननि में नंदलाल ।
मोहनी मूरत साँवरी सुरति, नैना बने विसाल
अधर सुधारस मुरली राजति, उर बैजंती माल।
छुद्र घंटिका कटि कटि तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल
मीराँ प्रभु संतन सुखदाई, भक्तबछल गोपाल।

अर्थ : मीराँ जी कहती है की है नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण। मेरी आँखों मे बस जाओ तुम्हारा रूप में मन को मोह लेने वाला है। तुम्हारे साँवले मुखड़े पर विशाल नेत्र बने हुए है। तुम्हारे होठो पर अमृत रूपी रस बरसाने वाली वंशी सुशोभित लग रही है। तुम्हारे गले मे वैजयंती की माला है। तुम्हारे कमर की करधनी में छोटी-छोटी घंटिया सुंदर लग रही है। तुम्हारे इन सुंदर घुंघरुओं से मधुर स्वर आ रही है। आखिर में मीराँबाई कहती है है प्रभु श्रीक्रष्ण तज्म संतों को सुख देने वाले और अपने भक्तों से प्रेम करने वाले हो।

रचनाएँ

राग गोविंद

● मीरा पद्मावली

● नरसीजी मायरा

● राग गोविंद

● गीतगोविंद की टीका

मीराबाई की सभी रचनाएँ बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध है। मीराबाई की भक्ति कृष्ण के प्रेम भाव को प्रकट करती है 

मीराबाई की मृत्यु ?

ज्ञाताओ के अनुसार मीरा अपने जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में द्वारका में भी रही थी। फिर 1547 ईस्वी में गुजरात के डाकोर स्थित रणछोड़ मंदिर में मीराबाई चली गई। ऐसा माना जाता है कि 1547 ईस्वी में ही वहीं रणछोड़दास के मंदिर में मीराबाई विलीन हो गई। 

 

FAQs

प्र. मीरा किसको अपना सब कुछ मानती थी ?

. श्री कृष्ण ।

प्र. कृष्ण को अपनाने के लिए मीरा ने क्या क्या खोया है ?

. लोकलाज खोया ।

प्र. मीरा कृष्ण प्रेम के बारे में क्या बताती है ?

. मीरा ने श्रीकृष्ण का प्रेम पाने के लिए सभी मर्यादा तोड़ दी थी। अपने आशुओ से सींचकर कृष्ण का प्रेम पाया।

प्र. राजा ने मीरा के लिए क्या भेजा था और क्यों ?

. राजा ने मीरा के लिए विष भेजा था ताकि मीरा की म्रत्यु हो जाए। क्योंकि मीरा कृष्ण प्रेम में नाचने गाने लगी थी      और राजा इसे अपने परिवार की बदनामी मानता था।

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