भगत सिंह जीवन परिचय ! Bhagat Singh Biography In Hindi | इतिहास2023

भगत सिंह जीवन परिचय ! Bhagat Singh Biography In Hindi | इतिहास 2023

क्रांतिकारी भगत सिंह को कौन नहीं जानता है। ये एक ऐसे क्रांतिकारी थे। जब देश ब्रिटिश काल के अधीन था बहुत कम लोग ऐसे थे जिनमे भगत सिंह जैसा साहस था। आजकल भगत सिंह और देश के दूसरे क्रांतिकारी जो भी हुए है जिनकी वजह से आज हम अगर ब्रिटिश अधीन नहीं है के नाम पर राजनीति बड़े पैमाने पर होती है

लेकिन उनके जीवन से प्रेरणा लेने के अलावा अगर हम दूसरा कोई भी स्वार्थ उनके नाम पर रखते है तो यह बेहद शर्मनाक बात है भगत सिंह उस समय के ऐसे क्रांतिकारी थे जो महात्मा गाँधी की विचारधारा के एकदम उलट यह मानते थे कि अगर हमे आजादी पानी है तो जिस भाषा में अंग्रेज काम करते है

उसी भाषा में उनको जवाब देना होगा और वह आखिरी साँस तक उनसे लड़ते रहे तो आइए जानते है भगत सिंह की जिन्दगी के बारे में कुछ और शानदार बातें आज के हमारे इस लेख द्वारा Bhagat Singh Biography Hindi। 

भगत सिंह जीवन परिचय ! Bhagat Singh Biography In Hindi
शहीद भगत सिंह

 

भगत सिंह की जीवनी (Bhagat Singh Biography Hindi

भगत सिंह का जन्म हुआ था 27 सितम्बर 1907 को एक सिख परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह था और माता का नाम था विद्यावती कौर। हालाँकि जन्म से ही देश के लिए कुछ कर गुजरने की भावना रखने वाले Bhagat Singh की सोच पर जो मुख्य प्रभाव पड़ा था उसका कारण था जलियाँवाला बाग़ में हुआ वह भीषण हत्याकांड जिसकी वजह से उनके मन में अंग्रेजों के प्रति द्वेष भर गया।

बड़े होते होते वह सोचने लगे कि किस तरह से इन अंग्रेजो से हम छुटकारा पाएं और इसके लिए उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से पढाई तक छोड़ दी और “नौजवान भारत सभा” की स्थापना की ताकि अधिक से अधिक युवाओ को इस से जोड़कर देश को इनसे कैसे छुटकारा पाया जाए। 

स्वतंत्रता के आन्दोलन में भागीदारी (Participation in the Freedom Movement)

हालाँकि Bhagat Singh रक्तपात के बिलकुल पक्षधर नहीं थे लेकिन जिन्दगी में कुछ चीजे ऐसी हुई जिनकी वजह से उन्होंने गांधीजी के असहयोग आन्दोलन के छिड़ने के बाद लगातार यह सोचते रहते थे कि कौनसा रास्ता है जो सही है। गांधीजी की अहिंसात्मक नीति या फिर क्रांतिकारी तरीका जिसमे अंग्रेजो के दमन की नीति की तरह ही उन्हें उन्ही की भाषा में जवाब दिया जाये। आपको पता हो तो जब जलियावाला बाग़ हत्याकांड हुआ था

उस समय भगत सिंह सिर्फ 12 वर्ष के थे। जैसे ही उन्हें इस हत्याकांड की सूचना मिली तो वो तुरंत 11 किलोमीटर पैदल चल कर जलियांवाला बाग पहुँच गये थे और इस हत्याकांड का उनके मन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा था। आगे चलकर Bhagat Singh बहुत सी रैलियों और प्रदर्शनों में हिस्सा लेने लगे और बाद में जब किसी वजह से गांधीजी ने अपने असहयोग आन्दोलन को बंद कर दिया

तो देश के तमाम युवा जो उसके सक्रिय हिस्सा थे उन लोगो में इसका एक नकारात्मक सन्देश गया और उनमे गुस्सा भर गया। Bhagat Singhभी उनमे से एक थे और अब उन्हें क्रांति के लिए हिंसा वाला मार्ग अनुचित नहीं लगने लगा था।

भगत सिंह की क्रांतिकारी गतिविधियाँ  (Revolutionary Activities) 

काकोरी काण्ड में क्रांतिकारियों को फांसी और कारावास दिए जाने के कारण भगत सिंह ने अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का “हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन” में विलय कर दिया जो की चन्द्रशेखर आज़ाद द्वारा बनाई गई पार्टी थी और उन्होंने उसे नया नाम “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” दिया । 

Bhagat Singh ने 17 सितम्बर 1928 को ए० एस० पी० सॉण्डर्स जो कि एक अधिकारी था उसे भगत सिंह ने अपनी योजना के अनुसार राजगुरु, चन्द्रशेखर आजाद और जयगोपाल के साथ मिलकर उसकी हत्या कर दी गयी। और लाला लाजपत राय की हत्या का प्रतिशोध लिया क्योंकि साइमन कमीशन के विरोध में हो रहे प्रदर्शन में लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज में हत्या कर दी गयी थी। 

8 अप्रेल 1929 को भगत सिंह ने उस समय की ब्रिटिश संसद जो नयी दिल्ली में थी में बम फेंककर अपने विरोध को जताया। हालाँकि वो चाहते तो हमले की तरह इस घटना को अंजाम दे सकते थे लेकिन उन्होंने इसकी बजाय संसद की बीच की जगह जहाँ कोई नहीं था। वहाँ पर बम फेंककर अपने विरोध को जताया गया और उन्होंने भागने की बजाय गिरफ्तारी दे दी। और ब्रिटिश के संसद भवन में बम फेंकने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत को चुना गया। 

और संसद में बम फेंकने के बाद इन पर जो आरोप लगे थे। उनके मुताबिक इन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई थी लेकिन भगत सिंह , सुखदेव और राजगुर के द्वारा सांडर्स को मारने के आरोप को सही पाया। और बाद मे इन्हें फांसी की सजा दी गयी। 

भगत सिंह की फांसी (Bhagat Singh’s hanging) 

23 March 1931 को शाम 7 : 30 बजे के आस-पास भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा दी गयी थी। बताया जाता है कि भगत सिंह अपने आखिरी समय में क्रांतिकारी ‘लेनिन” की जीवनी पढ़ रहे रहे थे। और ऐसे में जब उनसे उनकी आखिरी इच्छा के बारे में पूछा गया तो भगत सिंह ने कहा “मुझे यह पूरी करनी है” कुछ लोग यह भी कहते है कि उन्होंने यह भी कहा कि अभी रुको एक क्रांतिकारी दूसरे क्रान्तिकारी से मिल रहा है। फांसी के बाद अंग्रेज अधिकारीयों ने सोचा कि कंही लोग भड़क नहीं जाए इस के डर से उन्होंने भगत सिंह के शरीर के टुकड़े कर दिए ।

और उन्हें बोरियों द्वारा भरकर फिरोजपुर ले जाया गया और मिटटी के तेल द्वारा जलाने की कोशिश की लेकिन लोगो को जब इस बारे में पता चला तो इसे बीच में छोड़कर वो सतलुज नदी में फेंककर भाग गये। इसके बाद लोगो ने इनके शरीर के अवशेषों को निकालकर विधि विधान से अंतिम संस्कार किया। कहा जाता है कि भगत सिंह जब पहली बार चन्द्रशेखर आजाद से मिले थे तो इन्होने उनके सामने जलती हुई मोमबत्ती पर हाथ रखकर यह कसम खायी थी कि उनकी आखिरी साँस तक वो देश के लिए कुर्बान होने के लिए समर्पित है।उन्होंने अपना यह वादा पूरा कर दिखाया ।

 

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