गुरु रविदास का जीवन परिचय 2022 निबंध ! Guru Ravidas Biography, History, Jayanti in Hindi

गुरु रविदास का जीवन परिचय 2022 निबंध ! Guru Ravidas Biography, History, Jayanti in Hindi 

गुरु रविदास 15वीं और 16वीं शताब्दी के भक्ति आंदोलन के एक रहस्यवादी कवि, समाज सुधारक निर्गुणी संत थे निर्गुण सम्प्रदाय के ये बहुत प्रसिद्ध संत थे ।Guru Ravidas Biography, History, Jayanti in Hindi

और उन्होंने रविदासिया धर्म की स्थापना की थी । गुरु रविदास जयंती उनके जन्म के उपलक्ष्य में मनाई जाती है कहा जाता है कि गुरु रविदास ने कई भजन लिखे थे और उनमें से कुछ का जिक्र सिख धर्म की पवित्र पुस्तक, गुरु ग्रंथ साहिब में मिलता है । संत रविदास ने अपनी कालजयी रचनाओं से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में अपनी अहम भूमिका निभाई है

आम लोग उन्हें मसीहा मानते थे, क्यूंकि उन्होंने सामाजिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़े बड़े कार्य किये थे । कई लोग इन्हें भगवान् की तरह पूजते थे, और आज भी पूजते है । रविदास जी के गाने और वचनों को आज भी उनके जन्म दिवस पर सुनते है रविदास जी पंजाब, उत्तरप्रदेश एवं महाराष्ट्र में सबसे अधिक फेमस और पूजनीय है ।।

देशभर में 16 फरवरी को गुरु रविदास जी की जयंती बड़े ही धूमधाम से मनाई जा जाती है । ज्यादातर ये दिन उत्तर भारत में मनाया जाता है, जिसमें हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और चंडीगढ़ शामिल हैं ।।Guru Ravidas Biography, History, Jayanti in Hindi

Guru Ravidas Biography, History, Jayanti in Hindi

जीवन परिचय

गुरु रविदास जी का जन्म वाराणसी के पास सीर गोबर्धन गाँव में 1377 में हुआ था । इनकी माता कलसा देवी एवं पिता संतोख दास जी थे । लोगो का कहना है 1399 में कुछ दस्तावेजों के अनुसार रविदास जी ने 1450 से 1520 के बीच अपना जीवन धरती में बिताया था इनके जन्म स्थान को अब ‘श्री गुरु रविदास जन्म स्थान’ कहा जाता है ।।

 

गुरु रविदास का जीवन परिचय 2022 निबंध ! Guru Ravidas Biography ! History Jayanti in Hindi

 

 

नाम – गुरु रविदास जी

उपनाम – रोहिदास, रैदास, रुहिदास

जन्म – 1377

जन्म स्थान – वाराणसी, उतरप्रदेश (भारत)

पिता का नाम – श्री संतोख दास जी

माता का नाम – श्रीमती कलसा देवी जी

म्रत्यु – 1540

रविदास जी के पिता राजा नगर राज्य में सरपंच हुआ करते थे।  इनका जूते बनाने और सुधारने का काम हुआ करता था रविदास जी के पिता मरे हुए जानवरों की खाल निकालकर उससे चमड़ा बनाते और फिर उसकी चप्पल बनाते थे ।।

रविदास जी बचपन से ही एक बबहादुर और भगवान् को बहुत मानने वाले थे । रविदास जी को बचपन से ही उच्च कुल वालों की हीन भावना का शिकार होना पड़ा था, वे लोग हमेशा इस बालक के मन में उसके उच्च कुल के न होने की बात डालते रहते थे। रविदास जी ने समाज को बदलने के लिए अपनी कलम का सहारा लिया, वे अपनी रचनाओं के द्वारा जीवन के बारे में लोगों को समझाते थे और लोगों को शिक्षा देते कि इन्सान को बिना किसी भेदभाव के अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना चाहिए ।

शिक्षा :- बचपन में रविदास जी अपने गुरु पंडित शारदा नन्द की पाठशाला में शिक्षा लेने जाया करते थे । कुछ समय बाद ऊँची जाति वालों ने यह कह कर की ये छोटी जाति से है उनका पाठशाला में आना बंद करवा दिया था । पंडित शारदा नन्द जी ने रविदास जी की प्रतिभा को जान लिया था, रविदास जी समाज की उंच नीच बातों को नहीं मानते थे, उनका मानना था कि रविदास भगवान द्वारा भेजा हुआ एक बच्चा है ।

जिसके बाद पंडित शारदा नन्द जी ने रविदास जी को अपनी पर्सनल पाठशाला में शिक्षा देना शुरू कर दिया । वे एक बहुत प्रतिभाशाली और होनहार छात्र थे, उनके गुरु जितना उन्हें पढ़ाते थे, उससे ज्यादा वे अपनी समझ से शिक्षा गृहण कर लेते थे पंडित शारदा नन्द जी रविदास जी से बहुत प्रभावित रहते थे, उनके आचरण और प्रतिभा को देख वे सोचा करते थे, कि रविदास एक अच्छा आध्यात्मिक गुरु और महान समाज सुधारक बनेगा ।

रविदास जी के साथ पाठशाला में पंडित शारदा नन्द जी का बेटा भी पढ़ता था, वे दोनों अच्छे मित्र थे । एक बार वे दोनों खेल रहे थे 1-2 बार खेलने के बाद रात हो गई, जिससे उन लोगों ने अगले दिन खेलने के लिए कहा

। दुसरे दिन सुबह रविदास जी खेलने पहुँचते है, लेकिन उनका वो मित्र नहीं आता है तब वो उनके घर जाकर देखते है, वहां जाकर पता चलता है कि रात को उसके मित्र की मृत्यु हो गई है । ये सुन रविदास सुन्न पड़ जाते है, तब उनके गुरु शारदा नन्द जी उन्हें मृत मित्र के पास ले जाते है रविदास जी को बचपन से ही अलौकिक शक्तियां मिली हुई थी, वे अपने मित्र से कहते है कि ये सोने का समय नहीं है, उठो और मेरे साथ खेलो ये सुनते ही उनका मृत दोस्त खड़ा हो जाता है ये देख वहां मौजूद हर कोई अचंभित हो जाते है 

संत रविदास जी का आगे का जीवन

रविदास जी जैसे जैसे बड़े होते गए भगवान राम के रूप के प्रति उनकी भक्ति बढ़ती जाती है। वे हमेशा राम, रघुनाथ, कृष्णा, हरि, राजाराम चन्द्र, गोविन्द आदि शब्दों का उपयोग करते थे, जिससे उनको धार्मिक होने का प्रमाण मिलता था ।

रविदास जी मीरा बाई के धार्मिक गुरु हुआ करते थे । मीरा बाई राजस्थान के राजा की बेटी और चित्तोर गढ़ की रानी थी । वे रविदास जी की शिक्षा से बहुत अधिक प्रभावित थी । और वे उनकी एक बड़ी अनुयायी बन गई थी । मीरा बाई ने अपने गुरु के सम्मान में कुछ पक्तियां भी लिखी थी, जैसे – ‘गुरु मिलया रविदास जी..’ मीरा बाई अपने माँ बाप की एकलौती संतान थी, बचपन में इनकी माता के देहांत के बाद इनके दादा ‘दुदा जी’ ने इनको संभाला था. दुदा जी रविदास जी के बड़े अनुयाई थे|

मीरा बाई अपने दादा जी के साथ हमेशा रविदास जी से मिलती रहती थी । जहाँ वे उनकी शिक्षा से बहुत प्रभावित हुई. शादी के बाद मीरा बाई ने अपनी परिवार की रजामंदी से रविदास जी को अपना गुरु बना लिया था । मीरा बाई ने अपनी रचनाओं में लिखा है, उन्हें कई बार मृत्यु आयी लेकिन उनके गुरु रविदास जी ने मुझे बचाया ।।

रविदास जी का कैसा स्वभाव था :-

रविदास जी को उनकी जाति वाले लोग भी आगे बढ़ने से रोकते थे । लोग उन्हें रविदास जी को ब्रह्मण की तरह तिलक लगाने, कपड़े एवं जनेऊ पहनने से रोकते थे । लेकिन रविदास जी कहते थे सभी इन्सान को धरती पर समान अधिकार दिया गया है । वो अपनी मर्जी से जो चाहे कर सकता है जो मर्जी पहन सकते है । रविदास जी ने हर वो चीज करने लगे, कपड़े पहनने लगे । जो नीची जाति कहकर  मना कर दिया जाता था । जैसे धोती पहनना, तिलक लगाना जनेऊ आदि ।

ब्राह्मण लोग तो उनके इस कार्य के सख्त खिलाफ हो गए थे । उन लोगों ने वहां के राजा से रविदास जी के खिलाफ शिकायत कर दी थी रविदास जी सभी ब्राह्मण लोगों को बड़े प्यार और आराम से इसका जबाब देते थे उन्होंने राजा के सामने कहा कि शुद्र के पास भी लाल खून है, दिल है, उन्हें बाकियों की तरह समान अधिकार है ।

रविदास जी ने भरी सभा में सबके सामने अपनी छाती को चीर दिया और चार युग सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग की तरह, चार युग के लिए सोना, चांदी, तांबा और कपास से जनेऊ बना दिया । राजा सहित वहां मौजूद सभी लोग बहुत ज्यादा शर्मसार और चकित हो गए और उनके पैर छूकर गुरु जी को सम्मानित किया । राजा को अपनी बचकानी हरकत पर बहुत पछतावा हुआ|

उन्होंने गुरु से माफ़ी मांगी संत रविदास जी ने सभी को माफ़ कर दिया और कहा जनेऊ पहनने से किसी को भगवान् नहीं मिल जाते है उन्होंने कहा कि केवल आप सभी लोगों को वास्तविकता और सच्चाई को दिखाने के लिए इस गतिविधि में शामिल किया गया है उन्होंने जनेऊ उतार कर राजा को दे दिया । और इसके बाद रविदास जी ने न कभी जनेऊ पहना, और न ही कभी तिलक लगाया ।।

रविदास जी के सामाजिक कार्य

सबका एक ही कहना था कि रविदास जी को भगवान् ने धर्म की रक्षा के लिए धरती पर भेजा था, माना जाता है कि उस समय पाप बहुत ज्यादा बढ़ गया था, लोग धर्म के नाम पर जाति, रंगभेद  करते थे रविदास जी ने बहादुरी से सभी भेदभाव का सामना किया और विश्वास एवं जाति की सच्ची परिभाषा लोगों को समझाई सबका साथ देने का प्रयास किया ।

वे लोगों को समझाते थे कि इन्सान जाति, धर्म या भगवान् पर विश्वास के द्वारा नहीं जाना जाता है, बल्कि वो अपने कर्मो के द्वारा पहचाना जाता है. रविदास जी ने समाज में फैले छुआछूत के प्रचलन को भी ख़त्म करने के बहुत प्रयास किये । उस समय नीची जाति वालों को बहुत पर जुल्म किये जाते थे उन्हें पास नही बिठाया जाता थ

उनका स्कूल में पढ़ाई करने, मंदिर में पूजा करना, दिन के समय बाहर निकलना पूरी तरह से रोक लगा दी थी । यहाँ तक कि उन्हें गाव में पक्के मकान की जगह कच्चे झोपड़े में ही रहने को मजबूर किया जाता था समाज की ये दुर्दशा देख रविदास जी ने समाज से छुआछूत, भेदभाव को दूर करने की ठानी और सभी लोगों को सन्देश देना शुरू किया ।

रविदास जी लोगों को सन्देश देते थे कि ‘भगवान् ने इन्सान को बनाया है, न की इन्सान ने भगवान् को’ इसका मतलब है, हर इन्सान भगवान द्वारा बनाया गया है और सबको धरती में समान अधिकार है । संत गुरु रविदास जी भाईचारे और भेदभाव न रखने के बारे में लोगों को कई तरह की शिक्षाए दिया करते थे ।

उनके द्वारा द्वारा लिखे गए धार्मिक, पद, गाने एवं अन्य रचनाओं को सिख शास्त्र ‘गुरु गोविन्द ग्रन्थ साहिब’ में शामिल किया गया है । पांचवे सिख गुरु ‘अर्जन देव’ ने इसे ग्रन्थ में शामिल किया था । गुरु रविदास जी की शिक्षाओं के अनुयायियों को ‘रविदास्सिया’ और उनके उपदेशों के संग्रह को ‘रविदास्सिया पंथ’ कहते है ।।

गुरु रविदास जी की म्रत्यु कब, कहा और कैसे

गुरु रविदास जी की सच्चाई, भगवान् के प्रति भक्ति प्रेम, सद्भावना देख, दिन पे दिन उनके चाहने वाले दिन पर दिन बढ़ते ही जा रहे थे । दूसरी तरफ कुछ ब्राह्मण उनको मारने की योजना बना रहे थे । रविदास जी के कुछ विरोधियों ने जो कि वे ब्राह्मण थे उन्हीने एक सभा का आयोजन किया, जो कि गाँव से दूर आयोजित की गई और उसमें रविदास जी को आमंत्रित किया गया ।

गुरु जी उन लोगों की उस चाल को पहले ही समझ गए थे । फिर भी गुरु जी वहाँ जाकर सभा का शुभारंभ करते है । लेकिन गलती से गुरु जी की जगह उन लोगों का एक साथी भल्ला नाथ मारा जाता है । गुरु जी थोड़ी देर बाद अपने कक्ष में पहुच कर शंख बजाते है,शंख की ध्वनि सुनकर सभीअचंभित हो जाते है ।औरअपने साथी को मरा देख वे बहुत दुखी होते है, और दुखी मन से गुरु जी के पास जाते है ।।

रविदास जी के भक्तो का मानना है कि रविदास जी 120 या 126 वर्ष बाद अपने आप शरीर को त्याग दिया था । लोगों के अनुसार 1540 में उतर प्रदेश के वाराणसी में उन्होंने अंतिम सांस ली थी ।।

2022 में रविदास जयंती कब है

रविदास जयंती को माघ महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है । रविदास्सिया समुदाय के लोगो के लिए इस दिन वार्षिक उत्सव होता है वे बड़े धूम धाम से इसे मनाते है । वाराणसी में इनका जन्म स्थान ‘श्री गुरु रविदास जी में विशेष कार्यक्रम आयोजित होते है जहाँ लाखों की संख्या में रविदास जी के भक्त वहां पहुँचते है।

इस साल रविदास जी की जयंती 16 फरवरी 2022 में मनाई जाएगी । रविदास जी का 643 वा जन्म दिवस होगा । सिख समुदाय द्वारा जगह जगह नगर कीर्तन का आयोजन किया जाता है । स्पेशल आरती की जाती है।  मंदिर, गुरुद्वारा में रविदास जी के दोहे, गाने बड़ी धूम धाम से बजाये जाते है। रविदास जयंती मनाने का उद्देश्य यही है, कि गुरु रविदास जी की शिक्षा को याद किया जा सके, उनके द्वारा दी गई भाईचारे, शांति की सीख को दुनिया वाले एक बार फिर अपना सकें और सब मिलजुल कर अपना समय व्यतीत कर सके ।

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