Gitanjali Tagore Poems in Hindi | गीतांजलि पुस्तक से कुछ कविताओं के नाम 2023

Gitanjali Tagore Poems in Hindi | गीतांजलि पुस्तक से कुछ कविताओं के नाम 2023

गीताजंलि (Gitanjali Tagore Poems in Hindi पुस्तक कविता : हेलो दोस्तो आज हम आपके लिए लेकर आए है महान रबिन्द्रनाथ टैगोर जी की ‘गीतांजलि’ पुस्तक से कुछ महत्वपूर्ण कविताएं आशा करता हु इन्हें पढ़ कर आपको प्रश्नता मिलेगी ।। Gitanjali Tagore Poems in Hindi

Gitanjali Tagore Poems in Hindi | गीतांजलि पुस्तक से कुछ कविताओं के नाम
रबिन्द्रनाथ टैगोर जी

 

गीतांजलि  Gitanjali) किताब (A Book of Hindi Poems )

लेखक : रबिन्द्रनाथ टेगोर

भाषा : हिंदी

पेज : 163

संस्करण : 2015

गीतांजलि पुस्तक परिचय (Gitanjali Tagore Poems in Hindi)

‘गीतांजलि’ रबिन्द्रनाथ टेगोर द्वारा (1861-1941) सर्वाधिक प्रशिद्ध और पाठक पुस्तक है, इस पुस्तक के लिए इन्हें 1913 में विश्वप्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार मिला था। अपने पूरे जीवनकाल में  भारतीय साहित्यकार में छाए रहे। संगीत औऱ चित्रकला में रहते हुए अंतिम साँस तक सरस्वती की साधना की और भारतवासी के लिए ‘गुरुदेव’ के रूप में जाने लगे ।

इनका जन्म : 30 जून, 1924 ग्राम पनदाहा (गोड्डा, झारखंड)

शिक्षा : एम.ऐ (हिंदी), डी. लिट् , बी.एल, विशारद ।

भाषा ज्ञान : हिंदी, सन्ताली, बांग्ला, अंग्रेजी, संस्कृत, मुंडारी आदि ।पुरुस्कार : साहित्य अकादमी (नई दिल्ली ), नागरी लिपि परिषद ( नई दिल्ली ), राजभाषा विभाग,(बिहार पटना) आदि ‘गीतांजलि’ के गीत पिछली एक सदी से बांग्लाभाषी लोगों की आत्मा में बसे हुए है ।।

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इसमें मूल बांग्ला रचनाओं की गीतात्मक को बरकरार रखा है, इस योग्यता के कारण आप इन गीतों को याद रख सकते हों इनको गा सकते हो

गीतांजलि पुस्तक से कुछ कविताओं के नाम (Gitanjali Tagore Poems in Hindi)

Some names of poems from Gitanjali book ( गीतांजलि पुस्तक से कुछ कविताओं के नाम )

● मेरा माथा नत कर दो तुम

● में तुम सबकी और निहार रहा हु

● रात अँधेरी घिर आई थी

● छोड़ो मत, कसकर गहे रहो

● रह-रहकर चेतन सी होकर

● विविध वासनाएं है मेरी प्रिय प्राणों ने भी

मेरा माथा नत कर दो तुम

मेरा माथा नत कर दो तुम ।

अपनी चरण-धूलि तल में ।।

मेरा सारा संसार अहंकार दो ।

ड्डूबो-चक्षुओं के जल में ।।

गौरव-मंडित होने में नित ।

     मेने निज अपमान किया है ।।

घिरा रहा अपने मे केवल ।

  में तो अविरल पल-पल में ।।

     मेरा सारा संसार अहंकार दो ।

डुबो चक्षुओं के जल में ।।

अपना कर्रूँ प्रचार नही में ।

खुद अपने ही कर्मो से ।।

करो पूर्ण तुम अपनी इच्छा ।

मेरी जीवन-चर्या से ।।

चाहू तुमसे चरम शांति में ।

      परम् कान्ति निज प्राणों में ।।

रखे आड़ में मुझको ।

   आओ ह्रदय-पदम् दल में ।।

मेरा सारा अंहकार दो ।

डुबो चक्षुओं के जल में।।

में तुम सबकी और निहार रहा हु

में तुम सबकी और निहार रहा हु ।

स्थान मुझे भी दो तुम अपने बीच ।।

सबसे नीचे धूल-भरी धरणी पर।

सबसे नीचे धूल-भरी धरणी पर ।।

जहाँ न आसन का देना है मूल्य ।

जहाँ खिंचकर रेखा कुछ है, लेना ।।

जहाँ मान-अपमान का न है भेद ।

स्थान वहाँ दो मुझको अपने बीच ।।

जहाँ  आवरण बाहर का न रहे कुछ ।

जहाँ रहे परिचय अपना उन्मुक्त ।।

अपना कहने को न जहाँ कुछ भी हो

जहाँ न  ढ़के रहे अपने को सत्य,

वही खड़ा रह परम् दान से उनके

भर लूँगा में अपना सारा दैन्य ।

स्थान वहाँ दो मुझको अपने बीच ।।

◆  रात अँधेरी घिर आई थी

रात अँधेरी घिर आई थी ।

      काम खत्म हो गए सभी के ।।

हमने सोचा था, अब कोई ।

 आज नही आनेवाला है ।।

द्वार सभी हक चुके बन्द थे।

     रजनी-भर के हेतु, गाँव  के ।।

बोले थे एक-दो व्यक्ति पर ।

 महाराज निष्चय आवेंगे ।।

हँसकर हमने कहा तभी था ।

नही, नही कोई आवेगा ।।

तभी हुई आवाज द्वार पर ।

 हम-सबको जो पड़ी सुनाई,

तब हम बोले थे कि हवा से

सम्भव है आवाज़ हुई हो ।

दीप बुझाकर घर-घर मे हम

सोये थे भरकर आलस में ;

बोले थे एक-दो व्यक्ति पर,

 भरसक, दूत पधारा होगा ।

हँसकर हमने कहा, किंतु था,

हो सकता है, हवा रही हो ।

सुनी गई तब फिर निशीथ में,

    किसी चीज की ध्वनि-सी कोई,

निद्रालस में हमने तब था

सोचा-बादल गर्जन होगा ।

छोड़ो मत, कसकर गहे रहो,

छोड़ो मत, कसकर गहे रहो,

अजी, तूम्हारी होगी जय

अंधकार कट रहा स्यात है,

अजी, नही अब कोई भय ।।

लखो, भाल पर पूर्व दिशा के,

अन्तराल में सघन विपिन के

हुआ शुक्र-नक्षत्रोदय ।

अजी, नही अब कोई भय ।।

ये तो है केवल निशिचर,

अविश्वास जो अपने ऊपर;

निरास्वास, आलस, संसय

 नही भोर के है ये सब।।

आओ झटपट बाहर आओ,

देखो शीश उठाकर देखो

गगन हुआ अब ज्योतिर्मय ।

 रहा नही अब कोई भय ।।

 

रह-रहकर चेतन सी होकर

काँप उठी थी धरणी जैसे

बोले थे एक-दो व्यक्ति तब,

   पहिये की ध्वनि-सी लगती है

निद्रालस में बोले थे हम ।

बादल गर्जन ही वह होगा ।

तब भी रात अँधेरी ही थी, 

मेरी ध्वनि हो उठी तभी थी

जैसे कोई था पुकारता

   जाग पड़ो सब, करो न देरी ।

हाथ धरे छाती पर हमसब

काँप उठे थे डर के मारे

कहा किसी ने तब चुपके-से,

   राजा की दिख रही ध्वजा है 

तब हम सब जगकर बोले थे 

और नही करनी है देरी

कहां प्रकाश कहां थी माला,

    और कहा कोई आयोजन ।

राजा यहाँ पधारे सहसा,

कहा यहाँ कोई सिहांसन 

हाय नियति, हम लज्जित थे अति,

कहा सभा या कोई सज्जा ।

बोले थे एक-दो व्यक्ति तब,

व्यर्थ हमारा है यह क्रंदन

खाली हाथ शून्य घर मे ही,

करो शिघ्र उनका अभ्यर्थन ।

आए है गम्भीर रात में,

आज अँधेरे घर के राजा ।।

विविध वासनाएं है मेरी प्रिय प्राणों ने भी

विविध वासनाये है मेरी प्रिय प्राँणों ने भी,

वंचित कर उनसे तुमने की है रक्षा मेरी;

संचित कृपा कठोर तुम्हारी है मम जीवन मे ।।

 

अनचाहे ही दान दिए है तुमने जो मुझको,

आसमान, आलोक, प्राण तन-मन इतने सारे

बना रहे हो मुझे योग्य उस महादान के ही,

आती इछाओ के संकट से त्राण दिला करके

 

में तो कभी भूल जाता हूं, पुनः कभी चलना,

लक्ष्य तुम्हारे पथ का धारण करके अनन्त में

निष्ठुर , तुम मेरे सम्मुख हो हट जाया करते ।।

 

यह जो दया तुम्हारी है, वह जान रहा हु में ,

मुझे फिराया करते हो अपना लेने को ही ।

कर डालोगे इस जीवन को मिलन-योग्य अपने

रक्षा कर मेरी अपूर्ण इच्छा के संकट से ।।

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